चुनावी व्यवस्था और चुनावी सुधार

 

 चुनावी व्यवस्था और चुनावी सुधार





1. भारतीय निर्वाचन व्यवस्था: परिचय और संवैधानिक आधार

निर्वाचन का लोकतांत्रिक महत्व। चुनाव वह तंत्र है जिसके माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का वैध हस्तांतरण होता है। इसका महत्व केवल सरकार चुनने तक सीमित नहीं — चुनाव जवाबदेही का आधारभूत साधन भी है, क्योंकि हटाए जाने की संभावना ही सत्ताधारियों को उत्तरदायी बनाए रखती है। साथ ही चुनाव व्यवस्था को वैधता प्रदान करते हैं: हारने वाला पक्ष भी परिणाम स्वीकार करता है, और यही स्वीकृति लोकतंत्र की सबसे मूल्यवान पूँजी है।

संवैधानिक ढाँचा। भारतीय संविधान का भाग XV (अनुच्छेद 324 से 329) निर्वाचन से संबंधित है:

     अनुच्छेद 324 — संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित करता है।

     अनुच्छेद 325 — कोई व्यक्ति धर्म, मूलवंश, जाति अथवा लिंग के आधार पर निर्वाचक नामावली में सम्मिलित होने से वंचित नहीं किया जाएगा; प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र के लिए एक ही सामान्य नामावली होगी। यह प्रावधान औपनिवेशिक पृथक निर्वाचन-मंडल की व्यवस्था का सचेत परित्याग है।

     अनुच्छेद 326 — लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे; 1988 के 61वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई।

     अनुच्छेद 327-328 — संसद तथा राज्य विधानमंडलों को निर्वाचन संबंधी विधि बनाने की शक्ति।

     अनुच्छेद 329 — निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर सीमा; किसी चुनाव को केवल निर्वाचन याचिका के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।

वैधानिक ढाँचा। संवैधानिक प्रावधानों को क्रियान्वित करने के लिए दो प्रमुख अधिनियम हैं — जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (मुख्यतः निर्वाचक नामावली एवं निर्वाचन-क्षेत्रों से संबंधित) तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (चुनाव-संचालन, उम्मीदवारों की अर्हता एवं निरर्हता, भ्रष्ट आचरण, चुनावी अपराध और विवाद-निपटान से संबंधित)।

प्रतिनिधित्व की व्यवस्था। भारत एकल-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली अपनाता है — प्रत्येक क्षेत्र से एक प्रतिनिधि। अनुच्छेद 330 और 332 के अंतर्गत लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि यह आरक्षण पृथक निर्वाचन-मंडल नहीं है — आरक्षित क्षेत्र में सभी मतदाता मतदान करते हैं, केवल उम्मीदवार संबंधित वर्ग का होता है। यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह औपनिवेशिक व्यवस्था से भारतीय व्यवस्था की मूलभूत भिन्नता दर्शाता है।

2. निर्वाचन आयोग: संरचना, कार्य और शक्तियाँ

संवैधानिक स्थिति। भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना अनुच्छेद 324 से होती है। इसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई — इसी कारण यह तिथि राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाई जाती है।

संगठनात्मक संरचना। आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर नियत संख्या में अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं। आयोग 1950 से 1989 तक मुख्यतः एक-सदस्यीय रहा; 1993 से यह स्थायी रूप से तीन-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य कर रहा है, जिसमें निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं।

नियुक्ति संबंधी हालिया घटनाक्रम: पहले CEC और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति की कोई विधिक प्रक्रिया निर्धारित नहीं थी और यह कार्यपालिका के विवेक पर थी। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2 मार्च 2023) में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए यह निर्देश दिया कि जब तक संसद कोई विधि न बनाए, नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सिफ़ारिश पर होगी। इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 पारित किया, जिसके अंतर्गत चयन समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता (अथवा सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) सम्मिलित हैं; मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता वाली खोज समिति पाँच नामों का पैनल प्रस्तुत करती है।

इस पर चल रही बहस: आलोचकों का तर्क है कि मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटाकर उसमें दो सदस्य कार्यपालिका के कर दिए गए, जिससे आयोग की स्वतंत्रता का उद्देश्य कमज़ोर हो सकता है। समर्थकों का तर्क है कि अनुच्छेद 324 स्वयं यह उपबंध करता है कि नियुक्ति संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन होगी, अतः विधायी निर्धारण संवैधानिक रूप से उचित है। यह एक सक्रिय संवैधानिक बहस है; विद्यार्थियों को दोनों पक्ष प्रस्तुत करने चाहिए और नवीनतम स्थिति आधिकारिक स्रोतों से जाँचनी चाहिए।

स्वतंत्रता की सुरक्षाएँ: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिनसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है; अन्य निर्वाचन आयुक्तों को CEC की सिफ़ारिश पर ही हटाया जा सकता है।

प्रमुख कार्य।

     निर्वाचक नामावलियों की तैयारी, पुनरीक्षण और अद्यतन

     निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा तथा समस्त चुनाव-संचालन

     राजनीतिक दलों का पंजीकरण (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के अंतर्गत) तथा उन्हें राष्ट्रीय अथवा राज्य दल के रूप में मान्यता देना

     चुनाव-चिह्नों का आवंटन तथा दल-विभाजन की स्थिति में चिह्न संबंधी विवादों का निर्णय

     आदर्श आचार संहिता का प्रवर्तन

     उम्मीदवारों के चुनावी व्यय की निगरानी

     चुनाव-संबंधी आँकड़ों और सांख्यिकीय रिपोर्टों का प्रकाशन

     मतदाता जागरूकता (जैसे व्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं निर्वाचन सहभागिता कार्यक्रम)

     निर्वाचन संबंधी कुछ मामलों में राष्ट्रपति/राज्यपाल को परामर्श देना

आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct)। यह भारतीय चुनावी व्यवस्था की एक विशिष्ट संस्था है। यह कोई विधि नहीं है — इसका कोई वैधानिक आधार नहीं है; यह दलों की सहमति से विकसित हुई एक आचरण-संहिता है, जिसे आयोग चुनाव-कार्यक्रम की घोषणा से परिणाम-घोषणा तक प्रवर्तित करता है। इसकी शक्ति मुख्यतः नैतिक दबाव, सार्वजनिक निंदा और आयोग की अन्य शक्तियों से आती है। इसे वैधानिक दर्जा देने की माँग समय-समय पर उठती रही है; तर्क यह है कि इससे प्रवर्तन मज़बूत होगा, जबकि प्रति-तर्क यह है कि वैधानिक बनाने से मामला न्यायालयों में उलझ जाएगा और आयोग की त्वरित कार्रवाई की क्षमता घट जाएगी।

3. भारत में निर्वाचन प्रक्रिया

(1) निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा। निर्वाचन आयोग चुनाव की तिथियाँ घोषित करता है; इसी क्षण से आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो जाती है।

(2) निर्वाचक नामावली। 18 वर्ष या अधिक आयु का प्रत्येक पात्र नागरिक पंजीकरण का हकदार है। नामावली का आवधिक पुनरीक्षण होता है; मतदाता पहचान-पत्र (EPIC) की व्यवस्था 1993 से आरंभ हुई, जिसका उद्देश्य फ़र्ज़ी मतदान रोकना था।

(3) नामांकन एवं संवीक्षा। उम्मीदवार नामांकन-पत्र, प्रस्तावकों के हस्ताक्षर और जमानत राशि के साथ पर्चा दाखिल करता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33A के अंतर्गत उम्मीदवार को शपथ-पत्र में अपने आपराधिक मामलों की जानकारी देनी होती है; आयोग के निर्देशों के अनुसार संपत्ति, देनदारी और शैक्षिक योग्यता का प्रकटीकरण भी आवश्यक है। नामांकन की संवीक्षा के बाद नाम वापसी की अवधि होती है, फिर अंतिम सूची और चुनाव-चिह्न आवंटन।

(4) प्रचार एवं आचार संहिता। प्रचार मतदान समाप्ति से 48 घंटे पूर्व बंद हो जाता है। इस दौरान आदर्श आचार संहिता, व्यय-सीमा और अन्य नियम लागू रहते हैं।

(5) मतदान। मतदान गुप्त मतपत्र के सिद्धांत पर आधारित है। इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन (EVM) का प्रयोग क्रमशः बढ़ाया गया और 2004 के आम चुनाव से इसका व्यापक उपयोग हुआ। मतदाता सत्यापनीय पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) की व्यवस्था बाद में जोड़ी गई, जिससे मतदाता यह देख सके कि उसका मत सही दर्ज हुआ। NOTA (इनमें से कोई नहीं) का विकल्प उच्चतम न्यायालय के पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ (2013) के निर्णय के बाद उपलब्ध कराया गया, जिसमें न्यायालय ने नकारात्मक मतदान को मतदाता के अधिकार के रूप में मान्यता दी।

(6) मतगणना एवं परिणाम। मतगणना के बाद सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित होता है (प्रथम-पास-द-पोस्ट सिद्धांत)।

(7) निर्वाचन विवाद। अनुच्छेद 329(b) के अनुसार किसी चुनाव को केवल निर्वाचन याचिका द्वारा, संबंधित उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है — साधारण रिट याचिका से नहीं। इसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को अनावश्यक मुकदमेबाज़ी से बचाना है।

4. भारतीय निर्वाचन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ

(1) प्रत्यक्ष निर्वाचन। लोकसभा और विधानसभाओं के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं।

(2) प्रथम-पास-द-पोस्ट प्रणाली (FPTP)। प्रत्येक एकल-सदस्यीय क्षेत्र में सर्वाधिक मत पाने वाला विजयी होता है — उसे बहुमत (50%+) प्राप्त करना आवश्यक नहीं, केवल सापेक्ष बहुमत (plurality) पर्याप्त है।

इसके परिणाम: यह प्रणाली सरल, स्पष्ट और प्रायः स्थिर सरकार देती है, तथा प्रतिनिधि और क्षेत्र के बीच स्पष्ट संबंध बनाती है। परंतु इसका एक अनिवार्य परिणाम यह भी है कि मत-प्रतिशत और सीटों के बीच कोई आनुपातिक संबंध नहीं रहता — कोई दल कम मतों से अधिक सीटें और अधिक मतों से कम सीटें पा सकता है। बहुकोणीय प्रतिस्पर्धा में विजेता प्रायः कुल मतों के एक-तिहाई या उससे भी कम पर जीत सकता है, जिसका अर्थ यह है कि अधिकांश मतदाताओं की पसंद का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता। यही कारण है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व अथवा मिश्रित प्रणाली अपनाने के प्रस्ताव समय-समय पर उठते रहे हैं।

(3) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार।

(4) आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र — अनुच्छेद 330 एवं 332 के अंतर्गत, संयुक्त निर्वाचन-मंडल के साथ।

(5) गुप्त मतदान एवं इलेक्ट्रॉनिक मतदान — EVM और VVPAT सहित।

(6) स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की संस्थागत व्यवस्था — स्वतंत्र निर्वाचन आयोग, आदर्श आचार संहिता, चुनाव-व्यय की निगरानी, तथा न्यायिक समीक्षा।

(7) एक संवैधानिक सिद्धांत के रूप में। यहाँ एक महत्वपूर्ण बिंदु उल्लेखनीय है — उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को संविधान के आधारभूत ढाँचे का अंग माना है। इसका अर्थ यह है कि यह केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक संवैधानिक मूल्य है, जिसे साधारण विधायी परिवर्तन से समाप्त नहीं किया जा सकता।

5. भारतीय चुनावी राजनीति की प्रमुख चुनौतियाँ

(1) चुनावी व्यय और राजनीतिक वित्त। यह सर्वाधिक गंभीर चुनौती मानी जाती है। इसकी संरचना को समझना आवश्यक है: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत उम्मीदवार के व्यय की अधिकतम सीमा निर्धारित है (जो समय-समय पर संशोधित होती रही है; नवीनतम सीमा के लिए निर्वाचन आयोग की अधिसूचना देखें), परंतु राजनीतिक दल के व्यय की कोई सीमा नहीं है। इस विसंगति का व्यावहारिक परिणाम यह है कि दल के माध्यम से किया गया व्यय उम्मीदवार की सीमा के दायरे से बाहर रह जाता है, जिससे सीमा की प्रभावशीलता कम हो जाती है।

इसके तीन लोकतांत्रिक निहितार्थ हैं: पहला, यदि चुनाव लड़ने के लिए भारी संसाधन चाहिए, तो सामान्य नागरिक के लिए प्रवेश व्यावहारिक रूप से बंद हो जाता है — अर्थात औपचारिक रूप से समान अवसर व्यवहार में असमान हो जाता है। दूसरा, चंदा देने वालों का नीति पर अनुचित प्रभाव हो सकता है। तीसरा, अपारदर्शी वित्त और भ्रष्टाचार के बीच एक संभावित कड़ी बनती है।

(2) राजनीति का अपराधीकरण। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की उपस्थिति एक सतत चिंता रही है। वर्तमान विधिक स्थिति यह है कि आरोप लगना निरर्हता का आधार नहीं है; निरर्हता दोषसिद्धि पर होती है। यही वह बिंदु है जहाँ सर्वाधिक सुधार-बहस केंद्रित है (देखें धारा 15 एवं 16)।

(3) धनबल और बाहुबल। मतदाताओं को प्रलोभन (नकद, वस्तु, शराब), बूथ-कैप्चरिंग, तथा भय एवं दबाव — ये स्वतंत्र चुनाव के लिए प्रत्यक्ष खतरे हैं। EVM, केंद्रीय बलों की तैनाती और आयोग की निगरानी से बूथ-कैप्चरिंग जैसी समस्याएँ काफ़ी घटी हैं, परंतु प्रलोभन की समस्या बनी हुई है।

(4) जाति, धर्म एवं सामुदायिक ध्रुवीकरण। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 के अंतर्गत धर्म, जाति, समुदाय अथवा भाषा के आधार पर मत माँगना भ्रष्ट आचरण (corrupt practice) है। परंतु व्यवहार में इसका प्रवर्तन कठिन रहा है, क्योंकि अपील प्रायः परोक्ष और सांकेतिक होती है, जिसे विधिक रूप से सिद्ध करना कठिन होता है।

(5) मतदाता प्रलोभन एवं चुनावी भ्रष्टाचार।

(6) भ्रामक सूचना और डिजिटल चुनावी प्रचार। यह अपेक्षाकृत नई चुनौती है — सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचना का प्रसार, गुमनाम अभियान, लक्षित विज्ञापन, तथा डिजिटल प्रचार-व्यय की निगरानी की कठिनाई। आयोग ने डिजिटल प्रचार-सामग्री के पूर्व-प्रमाणन और सोशल मीडिया मंचों के साथ स्वैच्छिक आचार-संहिता जैसे कदम उठाए हैं, परंतु यह क्षेत्र अभी विकसित हो रहा है।

(7) दलों में आंतरिक लोकतंत्र एवं पारदर्शिता की कमी। यदि उम्मीदवार-चयन और नेतृत्व-चयन की प्रक्रिया कुछ व्यक्तियों तक सीमित हो, तो चुनावी प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता स्वयं प्रभावित होती है। धारा 29A के अंतर्गत पंजीकरण के लिए दलों को अपने संविधान में लोकतांत्रिक प्रावधान रखने होते हैं, परंतु प्रवर्तन कमज़ोर रहा है।

(8) निष्पक्षता संबंधी संस्थागत प्रश्न। आयोग की स्वायत्तता, सरकारी तंत्र के दुरुपयोग की शिकायतें, तथा नियुक्ति-प्रक्रिया से जुड़ी बहसें — ये समकालीन विमर्श का हिस्सा हैं और इन पर विद्वानों में मतभेद है।

6. चुनावी सुधार: अवधारणा और आवश्यकता

अर्थ। चुनावी सुधार (Electoral Reform) से अभिप्राय उन संवैधानिक, विधिक, प्रशासनिक एवं संस्थागत परिवर्तनों से है जो चुनावी प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी, समावेशी और विश्वसनीय बनाने के लिए किए जाते हैं।

प्रमुख उद्देश्य। (i) समान अवसर (level playing field) सुनिश्चित करना, ताकि धन अथवा सत्ता किसी को अनुचित लाभ न दे; (ii) पारदर्शिता बढ़ाना, विशेषकर राजनीतिक वित्त और उम्मीदवार-सूचना के क्षेत्र में; (iii) अपराधीकरण को रोकना; (iv) प्रतिनिधित्व को अधिक समावेशी बनाना; (v) संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा; और (vi) मतदाता का विश्वास बनाए रखना।

आवश्यकता का आधार। चुनावी सुधार को केवल प्रशासनिक सुधार मानना अपर्याप्त होगा। इसका संवैधानिक आधार यह है कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान के आधारभूत ढाँचे का अंग है; और इसका लोकतांत्रिक आधार यह है कि यदि चुनावी प्रक्रिया विकृत हो, तो उससे बनी सरकार की वैधता ही संदिग्ध हो जाती है। अतः चुनावी सुधार लोकतंत्र की निरंतर आत्म-सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है।

7. भारत में चुनावी सुधारों का विकास

प्रारंभिक काल (1950-1970 का दशक)। इस दौर में मुख्य ध्यान बुनियादी ढाँचा खड़ा करने पर था — निर्वाचन आयोग की स्थापना, दोनों जन प्रतिनिधित्व अधिनियमों का निर्माण, नामावली-प्रणाली का विकास, तथा चुनाव-संचालन की प्रक्रियाओं का मानकीकरण।

1980 और 1990 का दशक — सुधार का महत्वपूर्ण चरण। इस काल में कई निर्णायक परिवर्तन हुए: 1988 के 61वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 18 वर्ष की गई, जिससे करोड़ों युवा मतदाता जुड़े; मतदाता पहचान-पत्र (EPIC) की व्यवस्था 1993 से आरंभ हुई; निर्वाचन आयोग 1993 से स्थायी रूप से तीन-सदस्यीय निकाय बना; आदर्श आचार संहिता का प्रवर्तन कठोर हुआ; और 1996 में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33(7) में संशोधन कर उम्मीदवार के अधिकतम दो निर्वाचन-क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की सीमा तय की गई (यह दिनेश गोस्वामी समिति की सिफ़ारिश पर आधारित था)। 1996 के संशोधनों में प्रस्तावकों की संख्या बढ़ाना तथा जमानत राशि बढ़ाना भी शामिल था, जिसका उद्देश्य गैर-गंभीर उम्मीदवारों की संख्या घटाना था।

2000 के दशक से — पारदर्शिता एवं न्यायिक हस्तक्षेप का चरण। इस दौर की विशेषता यह रही कि सुधार का बड़ा हिस्सा न्यायपालिका और नागरिक समाज की पहल से आया, न कि केवल संसद से। इसकी विस्तृत चर्चा नीचे केस स्टडी में है।

तकनीकी सुधार। EVM का क्रमिक विस्तार और 2004 से व्यापक उपयोग; VVPAT की शुरुआत; मतदाता-सूची का डिजिटलीकरण; तथा शपथ-पत्रों एवं चुनावी आँकड़ों का ऑनलाइन प्रकाशन।

Case Study: उम्मीदवार-सूचना का प्रकटीकरण और "जानने का अधिकार"

पृष्ठभूमि: 1990 के दशक के अंत में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) नामक नागरिक संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की, जिसमें यह तर्क दिया गया कि मतदाता तब तक सूचित निर्णय नहीं ले सकता जब तक उसे उम्मीदवार की पृष्ठभूमि की जानकारी न हो।

मुख्य संवैधानिक प्रश्न: क्या मतदाता को उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और शैक्षिक योग्यता जानने का संवैधानिक अधिकार है?

न्यायालय का निर्णय: भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (2002) में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि मतदाता का जानने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंग है, और निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह उम्मीदवारों से यह जानकारी प्राप्त करे।

विधायी प्रतिक्रिया और उसका परिणाम: संसद ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर धारा 33A (सीमित प्रकटीकरण) और धारा 33B जोड़ी, जिसका आशय यह था कि उम्मीदवार को अधिनियम में निर्दिष्ट जानकारी से अधिक कुछ देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा। इस संशोधन को चुनौती दी गई, और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ (2003) में न्यायालय ने धारा 33B को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि वह मतदाता के जानने के अधिकार को कमज़ोर करती थी।

इसका महत्व: यह प्रकरण भारतीय चुनावी सुधार की प्रकृति को समझने के लिए आदर्श उदाहरण है। यह दर्शाता है कि (i) सुधार की पहल प्रायः नागरिक समाज से आती है; (ii) न्यायपालिका उसे संवैधानिक आधार देती है; और (iii) विधायिका की प्रतिक्रिया कभी-कभी सुधार को सीमित करने की दिशा में भी हो सकती है, जिस पर न्यायिक समीक्षा एक जाँच का कार्य करती है।

आलोचनात्मक निष्कर्ष: इन निर्णयों ने प्रकटीकरण को अनिवार्य अवश्य किया, परंतु उन्होंने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को अयोग्य नहीं ठहराया — निर्णय का भार मतदाता पर छोड़ दिया गया। यही कारण है कि प्रकटीकरण के बावजूद समस्या बनी रही, और आगे की बहस निरर्हता के प्रश्न पर केंद्रित हो गई।

8. प्रमुख समितियाँ और आयोग: चुनावी सुधार संबंधी सुझाव

भारत में चुनावी सुधार पर अनेक समितियों और आयोगों ने कार्य किया है। यहाँ केवल प्रमुख को, उनके मुख्य योगदान के साथ, प्रस्तुत किया गया है।

तारकुंडे समिति (1974-75)। यह एक अशासकीय (non-official) समिति थी, जिसे जयप्रकाश नारायण की पहल पर "सिटिज़न्स फॉर डेमोक्रेसी" के अंतर्गत गठित किया गया और जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति वी.एम. तारकुंडे ने की। इसने दो ऐसी सिफ़ारिशें दीं जो आगे चलकर लागू हुईं — निर्वाचन आयोग को तीन-सदस्यीय निकाय बनाना, तथा मतदान की आयु 18 वर्ष करना। यह उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि सुधार की पहल सरकार के बाहर से भी आ सकती है।

दिनेश गोस्वामी समिति (1990)। यह तत्कालीन विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में गठित सरकारी समिति थी और इसे चुनावी सुधार पर सर्वाधिक व्यापक एवं प्रभावशाली रिपोर्टों में से एक माना जाता है। इसकी प्रमुख सिफ़ारिशों में शामिल थे — एक उम्मीदवार के अधिकतम दो क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की सीमा (जो 1996 में लागू हुई); निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और उसके लिए स्वतंत्र सचिवालय; उप-चुनावों के लिए समय-सीमा; दल-बदल संबंधी सुधार; तथा सीमित राज्य-सहायता। इसकी अनेक सिफ़ारिशें लागू हुईं, परंतु दलों के विनियमन और वित्त से जुड़ी अनेक सिफ़ारिशें लागू नहीं हो सकीं — यह स्वयं एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है, जिसकी चर्चा नीचे की गई है।

वोहरा समिति (1993)। इसने अपराध, राजनीति और नौकरशाही के बीच के गठजोड़ की जाँच की और इस समस्या को आधिकारिक रूप से चिह्नित किया।

इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998)। इसने चुनावों के राज्य-वित्तपोषण (state funding) के प्रश्न की जाँच की। इसका मूल तर्क यह था कि यदि राज्य चुनाव का व्यय वहन करे, तो दलों की निजी चंदे पर निर्भरता घटेगी और धन का अनुचित प्रभाव कम होगा। समिति ने सहायता मुख्यतः वस्तु-रूप (in kind) में देने का सुझाव दिया और इसे मान्यता-प्राप्त दलों तक सीमित रखने की बात कही। यह सिफ़ारिश आज तक व्यापक रूप से लागू नहीं हुई — इस पर बहस जारी है।

विधि आयोग की रिपोर्टें। 170वीं रिपोर्ट (1999) — चुनावी विधियों के सुधार पर व्यापक सिफ़ारिशें, जिनमें दलों के आंतरिक लोकतंत्र और वित्त के विनियमन पर बल था। 244वीं रिपोर्ट (2014) — चुनावी निरर्हता पर, जिसमें गंभीर अपराधों में आरोप तय होने (framing of charges) के चरण पर निरर्हता का विवादास्पद परंतु महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया गया। 255वीं रिपोर्ट (2015) — चुनावी सुधार पर व्यापक रिपोर्ट, जिसमें चुनावी वित्त, दलों के विनियमन, तथा अन्य विषयों पर विस्तृत सिफ़ारिशें हैं।

राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग (2000-2002) तथा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007) ने भी चुनावी एवं संस्थागत सुधार पर महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें दीं।

एक महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक प्रवृत्ति। इन समितियों के अनुभव से एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है, जिसे विद्यार्थियों को पहचानना चाहिए: जो सुधार उम्मीदवारों और चुनाव-संचालन को विनियमित करते हैं, वे अपेक्षाकृत आसानी से लागू हो जाते हैं (जैसे दो-क्षेत्र की सीमा, आयु-सीमा, EPIC, EVM); जबकि जो सुधार राजनीतिक दलों को स्वयं विनियमित करते हैं — उनके वित्त, आंतरिक लोकतंत्र और उम्मीदवार-चयन को — वे प्रायः लागू नहीं हो पाते। इसका कारण स्पष्ट है: दूसरी श्रेणी के सुधार उन्हीं अभिकर्ताओं की शक्ति को सीमित करते हैं जिन्हें उन्हें पारित करना है। यह भारतीय चुनावी सुधार की केंद्रीय संरचनात्मक बाधा है।

9. चुनावी सुधार के प्रमुख क्षेत्र

(1) चुनावी व्यय एवं राजनीतिक वित्त में पारदर्शिता।

यह सर्वाधिक विवादित और सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुधार-क्षेत्र है। इसकी संरचनात्मक समस्या यह है कि उम्मीदवार के व्यय की सीमा है, दल के व्यय की नहीं; और चंदे के स्रोतों की पारदर्शिता सीमित रही है।

Case Study: चुनावी बॉण्ड और राजनीतिक वित्त की पारदर्शिता

पृष्ठभूमि: 2018 में चुनावी बॉण्ड योजना (Electoral Bonds Scheme) लागू की गई। इसके अंतर्गत कोई व्यक्ति या कंपनी अधिसूचित बैंक से बॉण्ड खरीदकर किसी राजनीतिक दल को दे सकती थी। सरकार का घोषित उद्देश्य यह था कि इससे राजनीतिक चंदे में नकद का प्रयोग घटेगा और वैध बैंकिंग माध्यम से चंदा आएगा। योजना लागू करने के लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, कंपनी अधिनियम तथा आयकर अधिनियम में संशोधन किए गए, जिनसे चंदा देने वाले की पहचान गोपनीय हो गई और कंपनियों के चंदे की पूर्व-निर्धारित सीमा हटा दी गई।

मुख्य संवैधानिक प्रश्न: क्या चंदा देने वाले की गोपनीयता मतदाता के जानने के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण है?

न्यायालय का निर्णय: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत संघ (15 फ़रवरी 2024, 2024 INSC 113) में उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉण्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यह योजना अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत मतदाता के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है, क्योंकि राजनीतिक दलों के वित्तीय स्रोतों की जानकारी के बिना मतदाता सूचित निर्णय नहीं ले सकता। न्यायालय ने संबंधित विधायी संशोधनों को भी निरस्त किया, बॉण्ड जारी करना तत्काल रोकने का निर्देश दिया, तथा अप्रैल 2019 से खरीदे गए बॉण्डों का विवरण निर्वाचन आयोग को देने और उसे सार्वजनिक करने का आदेश दिया।

महत्व और आलोचनात्मक मूल्यांकन: यह निर्णय 2002 के ADR निर्णय की तार्किक निरंतरता है — वहाँ उम्मीदवार की पृष्ठभूमि जानने का अधिकार स्थापित हुआ था, यहाँ दल के वित्तीय स्रोत जानने का। तथापि निर्णय के बाद भी मूल समस्या बनी हुई है: योजना समाप्त होने से पारदर्शिता बढ़ी, परंतु राजनीतिक वित्त के विनियमन का एक व्यापक, स्थायी ढाँचा अब भी विकसित होना शेष है। यही कारण है कि राज्य-वित्तपोषण, दल-व्यय की सीमा और चंदे के अनिवार्य प्रकटीकरण जैसे प्रस्ताव पुनः चर्चा में आए हैं।

(2) आपराधिक पृष्ठभूमि से संबंधित सुधार।

इस क्षेत्र में विधिक स्थिति चरणबद्ध रूप से विकसित हुई है:

दोषसिद्धि पर निरर्हता: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत कुछ अपराधों में दोषसिद्धि पर निरर्हता होती है। पहले धारा 8(4) निर्वाचित प्रतिनिधियों को यह संरक्षण देती थी कि अपील दाखिल करने पर निरर्हता स्थगित रहे। लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में उच्चतम न्यायालय ने धारा 8(4) को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिससे अब दोषसिद्धि के साथ ही (दो वर्ष या अधिक की सज़ा पर) सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है। यह अपराधीकरण के विरुद्ध सबसे प्रभावी विधिक हस्तक्षेपों में से एक माना जाता है।

प्रकटीकरण का विस्तार: पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन से संबंधित निर्णयों में न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि उम्मीदवार तथा उसे टिकट देने वाला राजनीतिक दल दोनों उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि को प्रकाशित करें, तथा दल यह भी बताए कि ऐसे उम्मीदवार के चयन का कारण क्या था। इस निर्देश का तार्किक आधार यह है कि इससे दल पर एक सार्वजनिक औचित्य-भार (burden of justification) आ जाता है।

अनसुलझा प्रश्न: विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट ने गंभीर अपराधों में आरोप तय होने के चरण पर निरर्हता का प्रस्ताव दिया था। इस पर बहस गहरी है — पक्ष में तर्क: दोषसिद्धि में वर्षों लग जाते हैं, अतः केवल दोषसिद्धि पर निर्भर रहने से समस्या बनी रहेगी। विपक्ष में तर्क: यह निर्दोषता की उपधारणा का उल्लंघन होगा, और विरोधियों के विरुद्ध झूठे मुकदमों का दुरुपयोग हो सकता है। न्यायालय ने स्वयं यह कहा है कि यह विधायिका का क्षेत्र है। यह प्रश्न आज भी अनसुलझा है और परीक्षा में उत्कृष्ट चर्चा-विषय है।

(3) राजनीतिक दलों का पंजीकरण एवं विनियमन। धारा 29A के अंतर्गत निर्वाचन आयोग दलों का पंजीकरण करता है। एक महत्वपूर्ण सीमा यह रही है कि आयोग के पास दल का पंजीकरण रद्द करने की स्पष्ट शक्ति नहीं है (कुछ अपवादों को छोड़कर)। आयोग और विधि आयोग दोनों ने यह शक्ति देने की सिफ़ारिश की है, विशेषकर उन पंजीकृत दलों के संबंध में जो कभी चुनाव नहीं लड़ते परंतु कर-लाभ प्राप्त करते हैं।

(4) दलों में आंतरिक लोकतंत्र। आवधिक संगठनात्मक चुनाव, पारदर्शी उम्मीदवार-चयन, और लेखा-परीक्षा की अनिवार्यता — ये प्रमुख प्रस्ताव हैं। यह वही क्षेत्र है जहाँ सुधार सबसे कम लागू हुए हैं, उपरोक्त संरचनात्मक कारण से।

(5) सूचना का प्रकटीकरण। उम्मीदवार के शपथ-पत्र का ऑनलाइन प्रकाशन, दलों के आय-व्यय विवरण और अंशदान रिपोर्ट का प्रकाशन — इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

(6) प्रचार एवं मीडिया का नियमन। पेड न्यूज़ की समस्या, प्रचार-सामग्री का पूर्व-प्रमाणन, तथा मतदान से पूर्व 48 घंटे की मौन अवधि का पालन।

(7) डिजिटल एवं सोशल मीडिया संबंधी चुनौतियाँ। डिजिटल प्रचार-व्यय की गणना, भ्रामक सूचना पर नियंत्रण, गुमनाम राजनीतिक विज्ञापन, तथा मंचों की जवाबदेही — यह एक विकसित होता हुआ क्षेत्र है जिसमें विधिक ढाँचा अभी अपर्याप्त है।

(8) प्रतिनिधित्व संबंधी सुधार। महिलाओं का प्रतिनिधित्व (संविधान का 106वाँ संशोधन, 2023, जिसका कार्यान्वयन जनगणना एवं परिसीमन से जुड़ा है); तथा चुनाव-प्रणाली में परिवर्तन (आनुपातिक अथवा मिश्रित प्रणाली) के प्रस्ताव, जिन पर विधि आयोग सहित विभिन्न निकायों ने विचार किया है।

10. समकालीन चुनावी सुधार का विमर्श

संस्थागत स्वतंत्रता की बहस। जैसा धारा 9 में चर्चा की गई, निर्वाचन आयोग की नियुक्ति-प्रक्रिया (2023 अधिनियम) पर सक्रिय संवैधानिक बहस चल रही है। यह विमर्श एक व्यापक प्रश्न से जुड़ा है — स्वायत्त संस्थाएँ किस सीमा तक कार्यपालिका से स्वतंत्र रह सकती हैं, और यह प्रश्न अन्य संस्थाओं के संदर्भ में भी उठता है।

तकनीक और चुनावी प्रक्रिया। EVM-VVPAT की विश्वसनीयता पर समय-समय पर प्रश्न उठे हैं और उच्चतम न्यायालय के समक्ष भी गए हैं; आयोग की स्थिति यह रही है कि मशीनें सुरक्षित हैं और VVPAT से सत्यापन उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त प्रवासी एवं दूरस्थ मतदान के लिए तकनीकी समाधानों पर भी चर्चा हुई है। यह क्षेत्र तेज़ी से बदल रहा है, अतः नवीनतम स्थिति आधिकारिक स्रोतों से देखी जानी चाहिए।

एक साथ चुनाव का प्रस्ताव। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव समकालीन विमर्श का एक प्रमुख विषय रहा है। पक्ष में तर्क: व्यय में कमी, प्रशासनिक तंत्र पर भार घटना, तथा आदर्श आचार संहिता के बार-बार लागू होने से शासन में आने वाली बाधा कम होना। विपक्ष में तर्क: इसके लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक होंगे और विधानसभाओं के कार्यकाल को समायोजित करना पड़ेगा, जो संघीय सिद्धांत तथा सदन के प्रति सरकार की उत्तरदायित्व-व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है; साथ ही राष्ट्रीय मुद्दे राज्य-स्तरीय मुद्दों पर हावी हो सकते हैं। यह विषय राजनीतिक रूप से विवादित है और इसकी वर्तमान विधायी स्थिति बदलती रही है — अतः इसे एक चल रही बहस के रूप में प्रस्तुत करना और नवीनतम स्थिति आधिकारिक संसदीय स्रोतों से जाँचना उचित होगा।

पारदर्शिता एवं जवाबदेही की दिशा। चुनावी बॉण्ड निर्णय के बाद राजनीतिक वित्त के नए ढाँचे की आवश्यकता; दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की माँग; तथा दल-व्यय की सीमा निर्धारित करने के प्रस्ताव — ये वर्तमान विमर्श के प्रमुख विषय हैं।

अन्य उभरते प्रस्ताव। राज्य-वित्तपोषण; "इनमें से कोई नहीं" (NOTA) के सर्वाधिक मत पाने पर पुनर्मतदान (विधि आयोग ने इसका समर्थन नहीं किया); वापस बुलाने का अधिकार (right to recall), जिस पर विधि आयोग ने यह चिंता व्यक्त की कि इससे निर्वाचित प्रतिनिधि की स्वतंत्रता कमज़ोर हो सकती है; तथा अनिवार्य मतदान — इन सभी पर विद्वानों में मतभेद है।

11. चुनावी सुधारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन

उपलब्धियाँ। भारतीय चुनावी व्यवस्था की उपलब्धियाँ तुलनात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय हैं — विश्व का सबसे बड़ा चुनावी अभियान नियमित रूप से सफलतापूर्वक संपन्न होता है; सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण बार-बार हुआ है; बूथ-कैप्चरिंग और खुली हिंसा जैसी समस्याएँ EVM, केंद्रीय बलों की तैनाती और कठोर निगरानी से काफ़ी घटी हैं; मतदान-दर बढ़ी है; और पारदर्शिता के क्षेत्र में — विशेषकर उम्मीदवार-प्रकटीकरण में — वास्तविक प्रगति हुई है।

सीमाएँ। पहली — प्रवर्तन की सीमा। अनेक प्रावधान विधि-पुस्तक में हैं, परंतु व्यवहार में उनका प्रवर्तन कमज़ोर है (जैसे धारा 123 के अंतर्गत सांप्रदायिक अपील पर प्रतिबंध)। दूसरी — दलों के स्व-विनियमन की समस्या, जो ऊपर रेखांकित की गई। तीसरी — राजनीतिक वित्त का अनसुलझा प्रश्न, जो सर्वाधिक गंभीर बना हुआ है। चौथी — अपराधीकरण का प्रश्न, जहाँ प्रकटीकरण तो हुआ पर निवारण नहीं। पाँचवीं — नई डिजिटल चुनौतियाँ, जिनके लिए विधिक ढाँचा अभी विकसित हो रहा है।

संस्थागत स्वतंत्रता बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप। यह मूल्यांकन का एक केंद्रीय आयाम है। निर्वाचन आयोग की प्रभावशीलता का इतिहास यह दर्शाता है कि संस्थागत स्वतंत्रता केवल विधिक प्रावधानों से नहीं आती — वह संस्था के नेतृत्व, परंपराओं और सार्वजनिक अपेक्षा से भी बनती है। इसीलिए नियुक्ति-प्रक्रिया की बहस केवल तकनीकी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का प्रश्न है।

प्रतिनिधित्व, समानता और वैधता। अंततः चुनावी सुधार का मूल प्रश्न यह है: क्या चुनावी प्रक्रिया समान अवसर प्रदान करती है? यदि चुनाव लड़ने के लिए भारी संसाधन आवश्यक हों, तो औपचारिक समानता व्यवहार में असमानता में बदल जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह अध्याय का भाग II अपने भाग I से जुड़ता है — दबाव-राजनीति और चुनावी वित्त, दोनों में मूल प्रश्न प्रभाव की असमानता का ही है।

सुधार की तीन कोटियाँ। मूल्यांकन को व्यवस्थित करने के लिए भारतीय चुनावी सुधारों को तीन कोटियों में देखा जा सकता है: (i) पूर्ण रूप से सफल — मतदान आयु, EPIC, EVM, तीन-सदस्यीय आयोग, आदर्श आचार संहिता का प्रवर्तन; (ii) आंशिक रूप से सफल — प्रकटीकरण (सूचना मिली, पर निवारण नहीं), व्यय-सीमा (उम्मीदवार पर है, दल पर नहीं); (iii) प्रायः असफल अथवा अधूरे — दलों का आंतरिक लोकतंत्र, राजनीतिक वित्त का व्यापक विनियमन, पैरवी की पारदर्शिता, और अपराधीकरण का निवारण।

भविष्य की प्राथमिकताएँ। इस विश्लेषण से जो प्राथमिकताएँ निकलती हैं वे हैं — राजनीतिक वित्त का पारदर्शी एवं व्यापक ढाँचा; दलों के आंतरिक लोकतंत्र का प्रभावी विनियमन; अपराधीकरण पर विधायी निर्णय; निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की मज़बूत संस्थागत सुरक्षा; डिजिटल प्रचार का नियमन; तथा पैरवी-गतिविधि की पारदर्शिता।